कथाकार– शुधा मिश्रा
आइ चुपचाप बेसल पि के सरके देखि हमरा केनादुन लागक कारण मोन भेल जे जाक पुछियनि , “कि भेल सर? सब ठीक अछि ने ?” मुदा किछुदिन आगुक बात याद परिगेल।हम ठामके ठामे रहि सोचमे परिगेलौ कि करु ?
किछु किछु नम्हर नम्हर दाह्री केश राखि आयल सरके केश दाह्री कटायल मुह सचमे खुलिउठल रहनि।सुन्दर लागिरहल छलखिन।हमर मुह सँ निकलि गेल ,“हमर पि के सर कतेक सुन्दर लागिरहल छथिन।कहु नजर नहि लागि जानि हुनका !,” कहि हम अपन आँखिमे सँ काजरक ठोप कन्पट्टीमे लगादति छियैन ।
बस कि छलै अहि बातके लक लोक उडि परलै ।
“ हमर पि के सर! हँ हँ कियाक नहि ! अँहिक पि के सर ! ”
हम अवाके रहिगेलौ सोचि जे ई सभ कि अर्थक अनर्थ लगारहल छथिन ?सच कहि त हमा
रा अपना एकदम नहि निक लागल।हम कुनो बेढंगक बात त नहि बाजल छलौ? हमर कहिदेला पर अहितरह सँ लेबाक कुनो जरुरत छै? हम त सबदिनमा सभसँग अहिना बाजि आयल।कुनो पहिल बेर त नहि छलै।हमरा अटरपटर बिनु बातक बात सुनैत नहि निक लागक कारण हम स्टाफ रुम सँ निकैल जाति छी ।
किछुदेरक बाद अयला पर सब अपन अपन क्लाश लेब गेलाक कारण स्टाफ रुम शान्त छलै। पि के सरके देखि हम जाक कहैछियैन, “ सर ई सब सभ बकबास छै।हमरा तेहन किछु नहि अछि? अपने त हमर बिहेव जनैत छी ने ।”
“जी म्याम।ओहिना लोक बाजिदति छै।हम तेहन सोच नहि रखैत छी।फेर हम अपने सँ पुर्ण तरहे परिचित छी छोरिदिय अहि तरहक बातके ।”
सरके मुह सँ एना सुनि हमरा बड निक लागल रहे।मोनके बहुत शितलता मिलल रहे ।

आई फेउर स्टाफ रुममे शान्त परिवृतिके आदमी सभके देख हम पुछिलति छियै जे सर “सब ठीक अछि ने? किछु दिक्कत त सेयर कायल जाय।दोस्तमहिम अहिदिनलेल त होइत छै ।”
“ नहि म्याम !तेहन किछु नहि।अहिना किछु पर्सनल कहु कि पारिवारिक झमेला कहु।”
“ जी कहल ने जाय।भसकैय मद्दत नहि कय पाबि।मुदा अपनेक मोन शान्त भयजायत ।”
किया नहि किया कहनोकाल हमरा सर बहुत मासुम लागिजाति
छलैथ । एक दिन हुनकर देल जबाब हम बेरबेर सबके सुनबैत रहैत छलियै जे कतेक सहज ढंग स सर हमरा कहने रहथिन जे केफटेरियामे जिनकर केश खुजल देखब ओ ए पी म्याम आर जिनकर केश बान्हल
देखब ओ स बी म्याम ।
सर कहैत छथिन ,“उमेर आब २५–२६ लाग लागल।मुदा वियाहके कुनो ताककुक नहि ।”
“ हमरा त लगैय अहिमे अपनेके ढिलासुस्ती अछि।एहन सभ्य सुशील लडका।पढल लिखल । रेपुटेड स्कुलमे कार्यरत।खानदानी घरपरिवार ।काठ्मान्डु भ्यालीमे शानदार मकान।जकरा अपने सँग वियाह हेतै ओ लडकी त हाथी चढिक गौर पुजने हेतै ।”
किछु सोचैत शान्त भय सर बजैत छथिन,“ म्याम कहाँ सभके अपने सनके नजरिया छकि ? लोकके तँ अहिठाम सरकारी नोकरी होबक चाहि । नहि तँ लडका विदेशमे होबक चाहिँ।अपना त नहि सरकारी नोकरी नहि विदेशेमे छी । उपर सँ चानिपरक केश सेहो उडल जारहल अछि ।लोक थोरही बुझतै अहिमे हमर दोष नहि ईह त हेरेडिटी प्रोबलेम छै?किछु देह पर मांसो पलायल सन छै । “ कहैत हाथ स पेट दिस ईशारा करैत छथिन ।”
हम सरके बात सुनि मौन रहिगेलौ । किछु नहि फुरायल कि कहितियैन हुनका ?

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