शुधा मिश्रा
हे नव वर्ष हम आतुर छी अँहाक सुवागतलाय । बहारिक बाट हरियर गोबर स निपलाय। ओहि निपल पर लाल एकरंगा ओछबलाय।पुरहरि भरि दुवारि सजबलाय।आमक नव पल्लव उपर प्रह्लाद लेसलाय ।
बस अँहा हमर विन्ती , हमर आग्रह मानैत आयब। अपना स रुसलके मनबति आयब । भटकलके बाट देखबति आयब।भुखललाय भोजन परसैत आयब।मरैयाके चार छारैत आयब । ठिठुरललाय घुर फुकैत आयब ।
खेतक खेसारी अछि अँहालाय । गुड भरल बगिया अछि अँहालाय।वसन्तक आगमन अछि अँहालाय।नव कनोजर अछि अँहालाय।पियर फुल अछि अँहालाय ।
विवेकहीन अहि संसारमे सबकिछु लगैय बैराग जाक।नहि पकवान लगैय प्रियगर नहि कोमल वस्त्र सँग रहल सिनेह । नहि रहल श्रृङ्गारमे रुचि। नहि कुनो आभुषण के सँग।भोजन लगैग अनुन।जलमे लगैय नुन ।
हे नव वर्ष ताय कहलौह विवेक लेने आयब।एक विवेक बिनु सबकिछु विरान।छल विवेक त छल परान।केना बुझबियै विवेकके ? अहि स सबकिछु अतत आसान।विवेक भरल दिमागमे नुन रोटी जेना छपन्न भोग।पुरान वस्त्र जेना पिताम्बर पटोर ।ताम पित्तर जेना हीरा जवाहर ।दिनके कि कहु ? राति सेहो अनमोल ।आगि लागल मन सेहो शितल । पुवारक सेज सेहो तकिया तोसक ।
छन बितल , मिनेट बितल , बितल घण्टा घरी। दिन बितैत हप्ता बितगेल , बितलागल मास।मास पर मास बितैत बितैत पूरा हायत अब साल । नहि खबर अछि, नहि कुनो पत्ता, कतक अछि नुकायल ? हमरे स आइ हेरायल अछि हमर विवेक भरल मन ।
मुनल नयनमे , सँग रहैय हमर ओ सदिखन
खनैक रहल कंगना बनि ओ हाथमे खनखन
ओकरो हियामे हम धडकति छी हमरा अछि बुझल
बहि परैछै ओकरो नयन , बहे मोर नयन जखन






